रोजगार-मॉंगे बिहार

कल-कल करती गंगा के दृश्यों को देखकर हर्ष से पुलकित हो जाता हूँ… इसलिए तो बौद्धमठ कहलाता हूँ….


जाओ,उठो,और लगो बिहार को बचाने में…… क्यों,भूल गए तुम इस मिट्टी के आंगन को…….


अपने रंग गए अपने पहचान से कुछ एेसा कर जाओ… बिहार की धरती के लिए तन-मन-धन सर्मपित कर जाओं…. नया उल्लास लियें,ऩई आस लिये आओ बिहार को सजाओ….

फिर वहीं,आर्यभट्ट,चन्द्रगूप्त मौर्या,गुरु गोविन्द की पुरानी धरती को बसाएंँ…. मैं,पढ़ु तु पढ़े मेरा बिहार पढ़े…. यह नारा को ऊंचा करु नई आस लिये….

अब मिट्टी भी थक चूकी वहीं गोबर,ऱाख को अपनाकर…… अब उसे उच्च कोटि का बीज,खाद देकर उसे ऊर्जाहीन बनॉंए……

मुझे नहीं,बनना चीन,जापान,मुझे तो सिर्फ तुम पहचान जाओ़… आओ मुझेअपनाकर तुम कुछ एेसा कर जाओ…….